गीतिकाव्य के तत्वों के आधार पर 'विनय पत्रिका' का मूल्यांकन

गीतिकाव्य के तत्वों के आधार पर 'विनय पत्रिका' का मूल्यांकन

    गीतिकाव्य क्या है? | गीतिकाव्य की परिभाषा | गीतिकाव्य के तत्व | विनय पत्रिका का तात्विक (विश्लेषण & मूल्यांकन) | Gitikavya | Vinay Patrika | Gitikavya Ke Adhar Par Vinay Patrika Ka Tatvik Mulyankan

    # 'विनय पत्रिका' का मूल्यांकन

    हिंदी में 'गीत' या 'प्रगीत' शब्द का व्यवहार अंग्रेजी के lyric के अनुवाद के रूप में प्रचलित है।

    हडसन के अनुसार-

    "लिरिक मूलत: वाद्ययंत्र पर गायी जाने वाली कविता है।" 

    महादेवी वर्मा ने 'गीत 'को परिभाषित करते हुए लिखा है-

    "सुख - दु:ख की भावावेशमयी अवस्था का विशेष गिने-चुने शब्दों में स्वर- साधना के उपयुक्त चित्रण कर देना ही गीत है।"

    गीत यदि दूसरे का इतिहास न कहकर वैयक्तिक सुख-दु:ख ध्वनित कर सके, तो उसकी मार्मिकता विस्मय की वस्तु बन जाती है, इसमें संदेह नहीं।"

    'विनयपत्रिका' तुलसी की एक श्रेष्ठ, भाव - पूर्ण, मुक्तक काव्य कृति है। इस काव्य में उन्होंने 'पद' की शैली का प्रयोग किया है।

    मध्ययुगीन हिंदी साहित्य में इस शैली का प्रयोग कई कवियों ने किया है‌। अष्टछाप के सभी कवियों की रचनाएं पद शैली में ही मिलती है। सूरदास के काव्य में इसका चरमोत्कर्ष दिखाई देता है। जैसे-


    " अखियां हरि दरसन की भूखी ।

      कैसे रहें रूप रसराची ये बतियां सुनि

      सूखी ।।"


    मीरा का 'बृहत्' काव्य भी पदों में ही लिखा गया है-


    "पायोरी मैंने राम रतन धन पायो ।"


    कबीर ने भी पदों में ही अपने सरस भाव व्यक्त किये है।


    गोस्वामी तुलसीदास ने पदों की शैली में 'गीतावली ', 'कृष्ण गीतावली'  तथा 'विनयपत्रिका' नामक तीनों ग्रंथों की रचना की है । 'गीतावली' और 'कृष्ण गीतावली' में भी सरस पदों को स्थान मिला हैं, परंतु 'विनयपत्रिका' के पद उनकी सरसता से भिन्न-भिन्न कोटि की सरसता रखते हैं।

    तुलसी के पूर्व या पश्चात उनके समान क्रमबद्ध तथा सुनियोजित रूप में 'विनय- पत्रिका' जैसी रचना ' पद ' शैली में किसी अन्य कवि ने नहीं की। अतः यह निश्चित है कि 'पद' शैली में लिखित विनय - साहित्य की दृष्टि से तुलसी की 'विनयपत्रिका' ही एकमात्र चमकता हुआ अद्भुत नक्षत्र है।


    गीतिकाव्य के तत्व

    गीतिकाव्य के तत्व निम्नलिखित हैं -

    ( १ ) संगीतात्मकता

    ( २ ) आत्माभिव्यक्ति या आत्मानुभूति

    ( ३ ) आत्मोद्गार का सहज प्रस्फुटन

    ( ४ ) कोमलकांत पदावली

    ( ५ ) संक्षिप्तता

    ( ६ ) एकरसता या एक ही भावना की प्रमुखता


    अब हम उपर्युक्त तत्वों के आधार पर 'विनयपत्रिका' की गीति योजना की समीक्षा करेंगे।


    (१) संगीतात्मकता

    संगीतात्मकता गीतिकाव्य का प्राण है। छंद में संगीत का समावेश होने पर गीतिकाव्य का जन्म होता है। जहां तक 'विनयपत्रिका' के गीतों का संबंध है डॉ. रामकुमार वर्मा के निम्न शब्द अवलोकनीय है-


    "इक्कीस रागों में 'विनयपत्रिका' का आत्मा- निवेदन है । इन रागों में मुख्य हैं- बिलावल, दंडक, वसंत, गौरी, रामकली, भैरवी, सोरठ, केदार, घनाश्री, सारंग, ललित, आक्षावटी, विभास आदि।"


    तुलसी ने लगभग सभी पदों की रचना किसी न किसी राग -रागिनी में की है। कुछ उदाहरण देखिए।


    केदार राग का एक उदाहरण द्रष्टव्य है-

    " कबहुंक अम्ब अवसर पाइ

      मेरिऔं सुधि धाइबी, कछु करून- कथा

      चलाई ।।"


    निम्नलिखित पद भैरवी राग में गाया जा सकता है-

    " मन पछितैहै अवसर बीते ।

      दुरलभ देह पाइ हरिपद भजु , करम, वचन

      अरु ही ते ।।"


    गौरी राग का भी एक उदाहरण द्रष्टव्य है-

    " श्रीरामचंद्र कृपालु भजु,मन हरण भवमय   

      दारुणं ।

      नवकंज- लोचन ,कंज -मुख, कर -कंज,

      पद कंजारुणं।।"


    सौरठ राग का एक उदाहरण देखिए -

    " ऐसो को उदार जग माहीं।

      बिनु सेवा जो द्रवै दीनपर  राम सरिस

      कोउ नाहीं ।। "


    इस प्रकार समस्त 'विनयपत्रिका' संगीत की तुला पर तुल जाती है । हम उसके सभी पदों को वाद्ययंत्रों पर सरलता से गा सकते हैं ।


    (२) आत्माभिव्यक्ति या आत्मानुभूति

    आत्माभिव्यक्ति गीतिकाव्य का सर्वप्रमुख तत्व है। जहां तक 'विनयपत्रिका' के पदों में तुलसीदास की वैयक्तिक अनुभूतियों की अभिव्यंजना का प्रश्न है, संपूर्ण कृति में मात्र तुलसीदास जी की वैयक्तिक भावनाएं ही मुखरित हुई है। तुलसी कलिकाल द्वारा संतापित किये जा रहे हैं, जिससे मुक्ति पाने के लिए वे अपने आराध्य राम के चरणों में- उनके राजदरबार में अपनी यह विनयपूर्ण पत्रिका भेजते हैं और प्रार्थना करते हैं कि वे तुलसी को अपनी शरण में स्थान देकर, उनको कलि  संतापों से अभय प्रदान करें। वे इसके लिए राम के सेवकों का भी सहयोग प्राप्त करते हैं। इस दृष्टि से उन्होंने शिव, हनुमान ,भरत ,लक्ष्मण आदि देवी-देवताओं से भी निवेदन किया है कि वे उन्हें राम भक्ति उपलब्ध होने का वरदान दें। तुलसी भक्त कवि है। अतः उनमें अनुभूति का स्वरूप भक्तिपरक है। निम्न पद में तुलसी की दीनता ही प्रकट होती है-


    "तू दयालु, दीन हौं, तू दानि , हौं भिखारी।

       हौं प्रसिद्ध पातकी, तू पाप पुंज हारी ।।"


    अपने आराध्य इष्ट देव भगवान राम की शरण में पहुंचकर वे कितनी भावुकता के साथ सरल हृदय से विनय करते है-


    " मैं हरि पतित- पावन सुने ।

      मैं पतित तुम पतित-पावन,दोउ बानक 

      बने ।।"


    और फिर उनकी भावुकता यहां तक बढ़ जाती है कि वे संसार में बिना सेवा के द्रवित होने वाला किसी अन्य को न पाकर उठते हैं


      "ऐसो को उदार जग माहीं।

      बिनु सेवा जो द्रवै दीनपर  राम सरिस

      कोउ नाहीं ।। " 


    तथा


    " जाके प्रिय न राम बैदेही

       तजिए ताहि भेटि बैरी सम,

       जद्यपि परम सनेही "


    अभिप्राय यह है कि ' विनयपत्रिका 'में

    आत्मानुभूति की प्रबल मात्रा में अभि- व्यंजना हुई है ।


    (३) आत्मोद्गार का सहज प्रस्फुटन 

    गीतों का व्यक्ति के प्रबल आत्मोद्गारों से सहज संबंध रहता है। इस कसौटी पर 'विनयपत्रिका' के पद पूर्णत: खरे उतरते हैं, क्योंकि भगवतभक्ति से अनुप्रेरित होकर अथवा कलिकाल द्वारा सताये जाने की दशा में तुलसी अनायास ही अपने इष्टदेव से यह याचना करने लग गये है कि वे उनको अपनी शरण में  स्थान देकर उनका उद्धार करने की कृपा करें-


    " काहें तें हरि मोहि बिसारो ।

      जानत निज महिमा, मेरे ऊध,

      तदपि न नाथ संभारो ।‌"


    तुलसी ने राम के आगे अपनी दीनता दिखाते हुए कहा है कि-

    " राम को गुलाम नाम रामबोला राख्यो राम,

      काम यहै नाम द्वै हौं कबहूं कहत हौं ।। "


    इस प्रकार 'विनयपत्रिका 'में तुलसी के आत्मोद्गार सहज रूप में अभिव्यक्त हुए है।


    (४) कोमलकांत पदावली

    'विनयपत्रिका ' में सर्वत्र सरल , सरस तथा सुकुमार शब्दावली में सरस तथा कोमल भावों की अभिव्यंजना हुई है। हम 'विनय- पत्रिका' के पदों को गाते- गाते केवल संगीत में ही तन्मय नहीं होते, अपितु कवि के भाव में सबसे अधिक निमग्न हो जाते हैं। तत्सम शब्दावली का एक उदाहरण देखिए-


    "श्रीरामचंद्र कृपालु भजु,मन हरण भवमय   

      दारुणं ।

      नवकंज- लोचन ,कंज -मुख, कर -कंज,

      पद कंजारुणं।।"


    निम्न पंक्तियों में हम तुलसी के अर्थ- गौरव का प्रदर्शन करते है-


    " केसव कहिं न जाइ का कहिये।

      देखत तव रचना विचित्र हरि !

      समुझि  मनहिं मन रहिये ।। "


    निम्नलिखित गणेश स्तुति के पद में उनका वाक् चातुर्य प्रकट होता है-


    " गाइये गनपति जगवंदन ।

      शंकर- सुवन- भवानी- नंदन।।"


    (५) संक्षिप्तता

    संक्षिप्तता गीत को प्रभावपूर्ण और भाव को अखंड बनाये रखती हैं। जहां तक 'विनय- पत्रिका' के संकलित पदों की समीक्षा का प्रश्न है यह कहा जा सकता है कि वे इस कसौटी पर खरे उतरते हैं। उदाहरण के रूप में निम्न पद द्रष्टव्य हैं-


    ( १ ) हरति सब आरती- आरती राम की।


    ( २ ) श्री हरि, गुरु पद कमल भजहु मन

            तजि अभिमान ।


    ( ३ ) राम कहत चलु, राम कहत चलु,

           राम कहत चलु भाई रे ।

          नाहिंन भव बेगारि महं,परिहौ छूटत

          अति कठिनाई रे।।"


    ( ४ ) राम राम रटु, राम राम रटु,

           राम राम जपु जीहा ।

           रामनाम-नव-नेह-मेहको मन!

           हठि होहि पपीहा ।।"


    कहना न होगा कि उपर्युक्त गीतों को किसी भी दृष्टि से लंबा नहीं कहा जा सकता । 'विनयपत्रिका' के अधिकांश गीत इसी प्रकार के रहे हैं ।


    (६) एकरसता या एक की भावना की प्रमुखता

    गीत का संबंध प्राय: किसी व्यक्तिगत सुख-दु:ख मयी अवस्था से होता है और उसका आकार भी संक्षिप्त होता है। अत: उसमें एक ही भावना की प्रमुखता रहती है। उदाहरण के लिए-


    " कबहुंक अंब अवसर पाइ।

      मेरिऔं सुधि धाइबी, कछु करून- कथा

      चलाई ।।"


    देखा जा सकता है कि जिसमें कवि का ध्यान इसी तथ्य की ओर रहा है कि वह सीता से अपनी सिफारिश कराकर राम के चरणों में स्थान प्राप्त कर सकें ।


    निष्कर्ष-

    संक्षेप में कहा जा सकता है कि तुलसी की 'विनयपत्रिका 'में गीतितत्व का सम्यक् निर्वाह हुआ है और गीति तत्वों की दृष्टि से 'विनयपत्रिका 'के पद पूर्णत: सफल हैं। गीति काव्य परंपरा में तुलसी की 'विनय- पत्रिका ' का महत्वपूर्ण स्थान है । हम उसमें भाव एवं संगीत का अद्भुत सामंजस्य पाते है।



    Written By:

     Dr. Gunjan A. Shah 
     Ph.D. (Hindi)
     Hindi Lecturer (Exp. 20+)
      

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